Transistor की परिभाषा, प्रकार, उपयोग और लाभ

हेलो दोस्तो, इस आर्टिकल में हम आपको बतायेगे की ट्रांजिस्टर क्या होता हैं यह कैसे काम करता हैं यहाँ आपको ट्रांजिस्टर की समस्त जानकारी मिलेगी, तो आप आर्टिकल को पूरा जरूर पढ़ें।

पिछले पेज पर हमने Resistance की जानकारी शेयर की हैं तो उस आर्टिकल को भी पढ़े। चलिए आज हम Transistor की परिभाषा, प्रकार, उपयोग एवं लाभ को पढ़ते हैं।

Transistor क्या हैं

Transistor एक ऐसा Semiconductor Electronic Device होता हैं जिसका प्रयोग इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल और विद्युत शक्ति को Switch या Amplify करने के लिए किया जाता हैं।

यह Electrons और electricity के Movement को control कर सकता है यह Electricity को बंद चालू कर सकता है और यह Current के Amount को भी control कर सकता है इसी कारण transistor electronic wave बना सकते हैं।

transistor एक small device होता है जिसका उपयोग electronic signals के flow को control करने और regulate करने के लिए किया जाता हैं।

इसी के कारण हम सब कंप्यूटर और मोबाइल में इतनी स्पीड से काम कर पाते हैं। यह डिजिटल सर्किट के लिए महत्वपूर्ण होता हैं।

इसके बिना किसी भी इलेक्ट्रानिक सर्किट को नहीं बनाया जा सकता हैं। क्या आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा इसका प्रयोग एम्प्लीफिकेशन के लिए किया जाता हैं। ये सिंग्नल को एंप्लीफाई करता हैं या सर्किट को बंद-चालू करने में मदद करता हैं।

ट्रांजिस्टर के तीन टर्मिनल होते हैं।

  • Emitter (उत्सर्जक) :- यह negative होता हैं
  • Base (आधार) :- Transistor को activate करता हैं।
  • Collector (संग्राहक) :- यह positive होता हैं।

ट्रांजिस्टर के प्रकार

ट्रांजिस्टर दो प्रकार के होते हैं।

  1. Bipolar Junction Transistor
  2. Field Effect Transistor

1. Bipolar Junction Transistor (BJT)

Bipolar Junction Transistor में चार्ज कैरियर दो प्रकार के होते हैं होल्स और इलेक्ट्रॉन। इसमें करंट होल्स और इलेक्ट्रॉन दोनों से निकलता है। बाइपोलर जंक्शन ट्रांजिस्टर में दो PN जंक्शन होते हैं जो सिग्नल को एम्प्लीफाई और मैग्नीफाई करते हैं। 

इसमें तीन टर्मिनल होते है।

  • Emitter
  • Base
  • Collector 

Bipolar Junction Transistor के प्रकार

बाइपोलर जंक्शन ट्रांजिस्टर के भी दो प्रकार होते हैं।

  • N-P-N Transistor
  • P-N-P Transistor

a). N-P-N Transistor

NPN symbol

इसमे दो N टाइप के बीच मे एक P टाइप के पदार्थ की परत लगाई जाती हैं उसे हम NPN ट्रांजिस्टर कहते हैं।

इसमें तीन टर्मिनल होते हैं।

  • Emitter
  • Base
  • Collector 

इसमें इलेक्ट्रॉनों Base Terminal के ज़रिये Collector से Emitter की ओर बहते है ।

जिसमे P-टाइप बेस होता हैं और पहला वाला N-टाइप की लेयर Emitter होती हैं और तीसरा वाला N-टाइप की लेयर Collector होता हैं।

b). P-N-P Transistor

PNP symbol

इसमे दो P टाइप के पदार्थ की परत के बीच मे एक N टाइप की परत लगाई जाती हैं तो उसे हम PNP ट्रांजिस्टर कहते हैं।

इसमें तीन टर्मिनल होते हैं।

  • Emitter
  • Base
  • Collector  

इसमे N-टाइप वाली लेयर Base होती हैं और पहली वाली P-टाइप की लेयर Emitter होती हैं और तीसरी वाली  P-टाइप की लेयर Collector होती हैं। 

Note- इसमे फर्क बस इतना हैं कि PNP में एमिटर का निशान अंदर की तरफ होता हैं और NPN में एमिटर का निशान बाहर की तरफ होता हैं तो इस बात का ध्यान रखें।

Field Effect Transistor

Field Effect Transistor एक 3 टर्मिनल वाला सेमीकंडक्टर डिवाइस होता हैं जिसमें करंट केवल मेजॉरिटी कैरियर के द्वारा ही Flow किया जाता हैं। इसे यूनीपोलर ट्रांजिस्टर भी कहते हैं। यह रिवर्स बॉयस होता हैं।

फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर बाइपोलर जंक्शन ट्रांजिस्टर से छोटे होते हैं और इसमे बिजली की कम लगती हैं जिससे इनको CMOS के डिजिटल लॉजिक चिप्स में लगाने के लिए सही माना जाता है।

इसमें तीन टर्मिनल होते है।

  1. Source :- सोर्स के द्वारा करंट चैनल में आता है।
  2. Gate :- गेट के द्वारा करंट को कंट्रोल किया जाता है।
  3. Drain :- ड्रेन के द्वारा करंट बहार निकलता है।

Field Effect Transistor दो प्रकार के होता हैं।

  1. MOSFET
  2. JFET

1. Metal-Oxide-Semiconductor Field-Effect Transistor (MOSFET)

मेटल ऑक्साइड फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर एक सेमीकंडक्टर डिवाइस हैं जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को स्विचिंग और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को एम्प्लीफाई में किया जाता हैं।

इसका उपयोग डिजिटल सर्किट और एनालॉग सर्किट में सबसे ज्यादा किया जाता हैं जिसमे इंसुलेटेड गेट होता हैं, जो कंडक्टिविटी को निर्धारित करता है।

2. Junction Field Effect Transistor (JFET)

जंक्शन फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर एक सेमीकंडक्टर डिवाइस होता है यह इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल स्विच, वोल्टेज कंट्रोल रजिस्टर और एम्प्लीफायर में उपयोग किया जाता हैं। यह एक यूनीपोलर उपकरण है। जो इलेक्ट्रॉन या होल्स पर निर्भर करता हैं। 

ट्रांजिस्टर के कार्य

ट्रांजिस्टर दो तरह से कार्य करता हैं।

  1. NPN
  2. PNP

1. N-P-N ट्रांसिस्टर के कार्य

NPN operation

यहाँ पर N-P-N ट्रांसिस्टर का forward bias सर्किट दिखाया गया हैं। इसमें Emitter को बैटरी के नेगेटिव से और कलैक्टर को बैटरी के पॉजिटिव से जोड़ दिया जाता हैं। बेस को कलैक्टर से कम पॉजिटिव वोल्टेज दिया जाता हैं।

एमीटर का निगेटिव चार्ज, मुक्त इलैक्ट्रोन्स को एमीटर जंक्शन की ओर विकर्षित करता है। बेस क्षेत्र का P-पदार्थ स्वाभाविक रूप से एमीटर द्वारा विकर्षित मुक्त इलैक्ट्रोन्स को आकर्षित कर लेता है। कुछ मुक्त इलैक्ट्रोन्स तो बेस क्षेत्र में होल्स के साथ जोड़ जाते हैं।

पर ज्यादा मुक्त इलैक्ट्रोन्स को कलैक्टर का प्रबल पॉजिटिव अपनी ओर खींच लेता है। इस प्रकार फ्री इलैक्ट्रोन्स एमीटर क्षेत्र से चलकर एमीटर जंक्शन से बेस क्षेत्र तथा कलैक्टर जंक्शन से होते हुए कलैक्टर क्षेत्र में पहुँच जाते हैं।

N-P-N ट्रांसिस्टर में तथा ट्रांसिस्टर सर्किट में करंट का प्रवाह मुक्त इलैक्ट्रोन्स के द्वारा होता हैं। एमीटर से चलकर कलैक्टर पर पहुँचने वाले मुक्त इलैक्ट्रोन्स की संख्या पर कंट्रोल बेस बायस द्वारा होता हैं और ट्रांसिस्टर के इसी गुण से इसका उपयोग एम्पलीफिकेशन कार्यो के लिए किया जाता हैं।

2. P-N-P ट्रांजिस्टर के कार्य

PNP operation

यहाँ P-N-P ट्रांसिस्टर का फारवर्ड बायस सर्किट दिखाया गया है। इसमें एमिटर को बैटरी के पॉजिटिव से ओर कलैक्टर को बैटरी के निगेटिव से जोड़ा जाता है। बेस को कलैक्टर से कम निगेटिव वोल्टेज दिया जाता हैं।

एमिटर का पॉजिटिव चार्ज, होल्स को एमिटर जंक्शन से पीछे हटाता हैं। बेस क्षेत्र का N-पदार्थ स्वाभाविक रूप से एमिटर द्वारा पीछे हटे हुए होल्स को आकर्षित कर लेता है। कुछ होल्स तो बेस क्षेत्र में मुक्त इलैक्ट्रोन्स के साथ जोड़ जाते हैं।

पर ज्यादा होल्स को कलैक्टर का तीव्र निगेटिव अपनी ओर खीच लेता है। इस प्रकार होल्स एमीटर क्षेत्र से चलकर एमीटर जंक्शन से बेस क्षेत्र तथा कलैक्टर जंक्शन के पार कलैक्टर क्षेत्र में पहुँच जाते हैं।

इस प्रकार P-N-P ट्रांसिस्टर में होल्स एमीटर से कलैक्टर की ओर चलते हैं। और मुक्त इलैक्ट्रोन्स कलैक्टर से एमीटर की ओर चलते हैं।

ट्रांसिस्टर के वाह्म परिपथ में मुक्त इलैक्ट्रोन्स एमीटर से चलकर बैटरी से होते हुए कलैक्टर तक पहुँच कर अपना सर्किट पूरा करते है।

एमीटर से कलैक्टर क्षेत्र की ओर चलने वाले होल्स की संख्या का कंट्रोल बेस बायस द्वारा किया जाता हैं और ट्रांसिस्टर के इसी गुण से इसका उपयोग एम्पलीफिकेशन कार्यो के लिए किया जाता हैं।

ट्रांजिस्टर को कैसे चेक करते हैं।

सभी ट्रांसिस्टर में PNP और NPN दो प्रकार होते है। उसमे एक बेस कलैक्टर जंक्शन तथा दूसरा बेस एमीटर जंक्शन होता हैं।

दोनो ट्रांसिस्टर में दो डायोड कार्य करते है। PNP ट्रांसिस्टर में बेस कैथोड की तरह और NPN ट्रांसिस्टर में बेस एनोड की तरह कार्य करता है।

मल्टीमीटर को रेसिस्टेन्स पर सैट कर लेते हैं।

1. PNP ट्रांसिस्टर टैस्टिंग

मल्टीमीटर को रेसिस्टेन्स की रेंज में सैट करते है। अब मल्टीमीटर की पॉजिटिव लीड को बेस पर तथा निगेटिव लीड को कलैक्टर पर कनैक्ट करते हैं।

इस अवस्था में बेस कलैक्टर जंक्शन रिवर्स बायस में होगा जिससे सर्किट में कोई भी करेंट प्रवाहित नही होगा और मल्टीमीटर अधिकतम रेसिस्टेन्स प्रदर्शित करेगा।

यही स्थिति निगेटिव लीड एमिटर और पॉजिटिव लीड बेस पर कनैक्ट करने से प्राप्त होगी। जब मीटर की प्रोब को चेंज करेगे निगेटिव बेस पर और पॉजिटिव एमिटर पर तब इस स्थिति में दोनों जंक्शन फारवर्ड बायस में आ जाते हैं। जिससे सर्किट में अधिकतम करेंट प्रवाहित होती हैं और मल्टीमीटर कम से कम रेसिस्टेन्स दिखता हैं।

अब ट्रांसिस्टर के कलैक्टर पर निगेटिव लीड तथा एमिटर पर पॉजिटिव लीड कनैक्ट करते हैं, इस स्थिति में ट्रांसिस्टर के दो डायोड में से एक डायोड रिवर्स बायस में रहता हैं जिससे मीटर अधिकतम रेसिस्टेन्स दिखता हैं।

मल्टीमीटर की प्रोब को बदलने पर भी पहले जैसी स्थिति प्राप्त होगी उपरोक्त सभी स्थितियों में यदि मल्टीमीटर इससे अलग रीडिंग दिखता हैं तो ट्रांसिस्टर ख़राब होगा।

2. NPN ट्रांसिस्टर टैस्टिंग

NPN ट्रांसिस्टर में बेस P टाइप मैटीरियल तथा कलेक्टर एमीटर N टाइप मैटीरियल से बने होते हैं। अतः जब मल्टीमीटर की पॉजिटिव लीड बेस पर तथा निगेटिव लीड को कलेक्टर और एमीटर पर कनैक्ट करते हैं तो दोनों ही जंक्शन फॉरवर्ड बायस में होता हैं।

इसीलिए इस स्थिति में मल्टीमीटर कम रेसिस्टेन्स दिखता हैं तो ट्रांसिस्टर सही है नही तो ख़राब। क्योकि इस स्थिति में उच्च रेसिस्टेन्स प्रदर्शित होने का अर्थ है जंक्शन का ओपन होना।

यदि मल्टीमीटर की लीड्स को बदल दिया जाये अर्थात निगेटिव लीड् को बेस पर तथा पॉज़िटिव को एमिटर या कलैक्टर पर तब मीटर उच्च रेसिस्टेन्स प्रदर्शित करेगा।

ट्रांसिस्टर के एमिटर तथा कलैक्टर के बीच मल्टीमीटर को किसी भी प्रकार से कनैक्ट करने पर उच्च रेसिस्टेन्स प्रदर्शित करना चाहिये तभी ट्रांसिस्टर सही होगा। यदि कम रेसिस्टेन्स प्राप्त होता हैं तो कलैक्टर एमिटर जंक्शन शॉर्ट होगा जिससे ट्रांसिस्टर ख़राब कहलायेगा।

ट्रांजिस्टर कैसे बनता है

ट्रांजिस्टर अर्धचालक पदार्थ से मिलकर बनता हैं। इसे बनाने के लिए ज्यादातर सिलिकॉन और जर्मेनियम का प्रयोग किया जाता हैं। इसमें तीन टर्मिनल होते हैं जिनका इस्तेमाल दूसरे सर्किट से जोड़ने में किया जाता हैं। ये तीन टर्मिनल हैं बेस, कलेक्टर और एमीटर।

ट्रांजिस्टर के कई प्रकार होते है और सब का काम अलग अलग होता हैं। ट्रांसिस्टर टर्मिनल की किसी एक जोड़ी में करंट या वोल्टेज डालने पर, अन्य ट्रांसिस्टर की जोड़ी में करंट बदल जाता हैं। बहुत सारे उपकरण में ट्रांजिस्टर का इस्तेमाल किया जाता हैं जैसे एम्पलीफायर, स्विच सर्किट, ओसीलेटर्स आदि।

Transistor के उपयोग

ट्रांजिस्टर को बहुत जगह उपयोग किया जाता हैं इसके बहुत से उपयोग हैं।

  • ट्रांजिस्टर का उपयोग सबसे ज्यादा Inverter के सर्किट में किया जाता हैं।
  • ट्रांजिस्टर का उपयोग डिजिटल गेट बनाने में किया जाता हैं।
  • ट्रांजिस्टर का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक के सर्किट में होता हैं।
  • Transistor का उपयोग एक Switch की तरह होता हैं।
  • Transistor का उपयोग Amplifier के रूप में होता हैं।
  • इनका उपयोग करके आप एक बेहतर क्षमता वाले circuit को develop कर सकते हैं।
  • इसका उपयोग करके आप एक single integrated circuit develop कर सकते हैं।
  • टांसिस्टर का उपयोग Electric Current या Voltage दोनों को संचालित करने और Insulate करने के लिए किया जाता हैं।

Transistor के लाभ

Transistor के बहुत से लाभ होते हैं। आगे पढ़ते हैं।

  • ट्रांजिस्टर तेजी से काम करते हैं।
  • ट्रांजिस्टर सस्ते होते हैं और यह size में छोटे होते हैं।
  • यह एक छोटी Mechanical Sensitivity वाला device होता हैं।
  • ट्रांजिस्टर का उपयोग करने के लिए कम वोल्टेज की जरुरत पड़ती हैं।
  • ट्रांजिस्टर की उम्र बहुत लम्बी होती है यह जल्दी से खराब नहीं होते हैं।
  • ट्रांजिस्टर ज्यादा इलेक्ट्रॉनों को नुकसान नहीं होने देते हैं।
  • माइक्रोप्रोसेसर में हर एक चिप पर ट्रांजिस्टर लगा होता हैं।

ट्रांजिस्टर के नुकसान

ट्रांजिस्टर के फायदे के साथ साथ इसके नुकसान भी होते हैं तो आगे पढ़ते हैं ट्रांजिस्टर के क्या नुकसान हैं।

  • Transistor का नुकसान यह हैं की इसमें उच्च इलेक्ट्रान गतिशीलता की कमी होती हैं।
  • यह बड़ी ही आसानी से किसी भी Electrical और Thermal घटना से खराब हो सकते हैं।

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उम्मीद हैं दोस्तों अब आप समझ गए होगे की ट्रांजिस्टर क्या होता हैं अगर आपको इससे संबंधित कोई भी जानकारी चाहते हैं तो आप नीचे comment करके हमसे पूछ सकते हैं।

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